Saturday, August 16, 2014

राधे कृष्णा

श्री कृष्ण कहते हैं -
"जो तुम हो वही मैं हूँ हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं हैं।
जैसे दूध में श्‍वेतता, अग्नि में दाहशक्ति और पृथ्वी में गंध रहती हैं
उसी प्रकार मैं सदा तुम्हारे स्वरूप में विराजमान रहता हूँ।"

"श्रीराधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर घनश्याम।
करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥"

राधा नाम की महिमा का स्वयं श्री कृष्ण ने इस प्रकार गान किया है-
"जिस समय मैं किसी के मुख से ’रा’ अक्षर सुन लेता हूँ, उसी समय उसे अपना उत्तम भक्ति-प्रेम प्रदान कर देता हूँ और ’धा’ शब्द का उच्चारण करने पर तो मैं प्रियतमा श्री राधा का नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे-पीछे चल देता हूँ"

आधौ नाम तारिहै राधा।
र के कहत रोग सब मिटिहैं, ध के कहत मिटै सब बाधा॥
राधा राधा नाम की महिमा, गावत वेद पुराण अगाधा।
अलि किशोरी रटौ निरंतर, वेगहि लग जाय भाव समाधा॥
"जय श्री राधेकृष्णा"

Sunday, August 10, 2014

ईश्वर

"ॐ हरि ॐ "                                                   ईश्वर
चेतना की वह शक्ति है जो ब्रह्माण्ड के भीतर और बाहर जो कुछ है, उस सब में संव्याप्त है ।।
             उसके अगणित क्रिया कलाप हैं जिनमें एक कार्य इस प्रकृति का- विश्व व्यवस्था का संचालन भी है ।।
            संचालक होते हुए भी वह दिखाई नहीं देता क्योंकि वह सर्वव्यापी सर्वनियंत्रक है ।।
           ईश्वर में विश्वास भय से मुक्त करता है । ईश्वर में अति विश्वास और अपार श्रद्धा से मृत्यु के भय से भी मुक्ति मिलती है ।।
             जल की एक बूँद को महासागर से क्या भय; महासागर में गिरकर बूँद का अस्तित्व महासागर में विलीन हो जायेगा । बूँद भी महासागर बन जायेगी ।।
             हिन्दुत्व का सर्वोच्च विचार प्रलय से भी भयभीत नहीं है क्योंकि उस समय कर्मफल से सबको मुक्ति मिल जाती है ।
                              "ॐ भगवते वासुदेवाय नम:"

Saturday, August 9, 2014

रक्षाबंधन

 ‪रक्षाबंधन‬ पर्व
भाई-बहन के अटूट प्रेम को समर्पित है
इस दिन बहने अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती हैं
और भाई अपनी बहनों की रक्षा का संकल्प लेते हुए अपना स्नेहाभाव दर्शाते हैं।
 राखी बंधवाते समय इस मंत्र का उच्चारण करें ..
येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चलः॥

रक्षा बंधन की पौराणिक कथा..
देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नज़र आने लगे।
भगवान इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गये। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी।
उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया।
संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इन्द्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए थे।
उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बाँधने की प्रथा चली आ रही है।
यह धागा धन,शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है।
ॐ श्री भगवते वासुदेवाय नम:

Thursday, August 7, 2014

तिरंगा

"कुछ नशा तिरंगे की आन का है
कुछ नशा मात्रभूमि की शान का है

हम लहराएंगे हर जगह तिरंगा
नशा ये हिंदुस्तान की शान का है "

मेरी जान तिरंगा हैं

ये आन तिरंगा है,
ये शान तिरंगा है,
मेरी जान तिरंगा है,

ये आन तिरंगा है,
ये शान तिरंगा है,
मेरी जान तिरंगा है,

अरमान तिरंगा है,
अभिमान तिरंगा है,
मेरी जान तिरंगा है,
ये आन तिरंगा है,
ये शान तिरंगा है,

याद शहीदोँ की आएगी जब ये ध्वज लहराएँगे
जब ये ध्वज लहराएँगे,

इसके तीनो रंग कयामत
सदियोँ तक लहराएँगे,

आजादी जिनके दम से है
उनका नाम बड़ाएँगे,

उनकी कुरबानी को यारो
हरगिज नहीँ लजाएँगे,

विश्वाश तिरंगा है
वरदान तिरंगा हैै
मेरी जान तिरंगा है,

इसके खातिर कसम है हमको
अपना शीश कटा देँगे,

जितना भी इस जिस्म मेँ बाकि
सारा लहू बहा देँगे,

इसे खातिर जो हम ठानेँगे
करके हम दिखला देँगे,

अपनी धरती के आगे हम
सारा गगन झुका देँगे,
ईमान तिरंगा है
भगवान तिरंगा है,

मेरी जान तिरंगा है
मेरी शान तिरंगा है ।।

Wednesday, August 6, 2014

प्रभू भक्ति

ॐ भगवते वासुदेवाय नमः
कुछ लोग कहते हैं कि
धनहीन लोग क्षुद्र हैं; कुछ कहते हैं कि गुणहीन लोग क्षुद्र हैं; पर,
सभी वेद-पुराण जाननेवाले श्रीव्यास मुनि कहते हैं कि नारायण का (भगवान का) स्मरण न करनेवाले क्षुद्र हैं ।

धनलालसा से जिस तरह धनवान की स्तुति (इन्सान) करता है,
वैसे यदि विश्वकर्ता (भगवान) की करे, तो कौन बंधन मुक्त न हो ?

यम की दूती जरा (बुढापा) कान के करीब आकर बताती है कि
"हे लोगों ! सुनो । परायी स्त्री और पराया धन लेने का खयाल छोड दो,
और रमानाथ (भगवान) के चरणों में ध्यान धरो ।

भगवान की लीलाएँ अद्भुत हैं ।
उनके जन्म, कर्म, और गुण दिव्य हैं ।
उन्हीं का श्रवण, कीर्तन, और ध्यान करना चाहिए ।
सब भगवान के लिए करना सीखना चाहिए ।
ॐ श्री हरि कृष्णाय नमः

Monday, August 4, 2014

“ॐ हनुमते नमः”

.                          “ॐ हनुमते नमः”   
"दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।"

  श्री हनुमान की कृपा व स्मरण से ही आसान हो जाते हैं मुश्किल से मुश्किल काम,
                                      मंगलवार का दिन ऐसे  मंत्र से -
"हनुमन्नंजनी सुनो वायुपुत्र महाबल:। अकस्मादागतोत्पांत नाशयाशु नमोस्तुते।।"
                                    श्री हनुमान के ध्यान से जीवन मंगलमय बनाने के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है।
                              इस दिन श्रीहनुमान का ध्यान ग्रह, मन, कर्म व विचारों के दोषों को दूर कर सुख-सफलता देने वाला माना गया है। 

                              इस मन्त्र का नित्य प्रति १०८ बार जप करने से सिद्धि मिलती है -
” ॐ एं ह्रीं हनुमते रामदूताय लंका विध्वंसनपायांनीगर्भसंभूताय शकिनी डाकिनी विध्वंसनाय
किलि किलि बुवुकरेण विभीषणाय हनुमद्देवाय ॐ ह्रीं श्रीं ह्रौं ह्रां फट् स्वाहा ।”

भारत के प्रधानमंत्री "मोदी"

देश का प्रधानमंत्री
ऐसा होना चाहिए जिसके क्रिया कलापों से और उसकी छवि से देश वासियों का सीना गर्व से फ़ूल जाए उसको देखने के साथ ही अंतर्मन से आवाज आये कि
" हाँ ये है हमारा नेता , ये बदलेगा हमारे जीवन को ,
हमारा नेता धार्मिक हो , हिंदुत्व की मान्यताओं एवं स्वरुप का जीता जागता स्वरुप हो ,
जिस हिंदुत्व और धार्मिकता की अनुभूति से एक सनातनी का रोम रोम पुलकित हो सकता है ,
उसी स्वरुप का उदाहरण हमारा प्रधानमंत्री विदेश जाकर भी दे सकता हो ना की विदेश जाकर सेक्यूलरिज्म का पाठ पढ़ाए .....!!
क्या आपमें से किसी ने आज के पूर्व विदेश में भारत वर्ष के प्रधानमन्त्री का ऐसा स्वरुप देखा है ,
अरे, विदेश में रुद्राक्ष की कंठमाला और भगवा वस्त्र पहने हुए ये इंसान किसी देश का प्रधानमन्त्री है .....
या कोई सिद्ध महापुरुष ,
एक साधू और धर्म स्वरुप 'धर्मात्मा' .....????
  "ॐ नमः शिवाय"

Friday, August 1, 2014

तप

.                      ॐ ॐ ॐ
             हिन्दुत्व मे तप की महत्ता...
मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन, आत्मचिंतन, मनोनिग्रह, भावों की शुद्धि - यह मन का तप कहलाता है ।

उद्वेग को जन्म न देनेवाले, यथार्थ, प्रिय और हितकारक वचन (बोलना), (शास्त्रों का) स्वाध्याय और अभ्यास करना, यह वाङमयीन तप है ।

देवों, ब्राह्मण, गुरुजन-ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा - यह शरीर का तप कहेलाता है ।

यस्माद्विघ्न परम्परा विघटते दास्यं सुराः कुर्वते
कामः शाम्यति दाम्यतीन्द्रियगणः कल्याणमुत्सर्पति ।
उन्मीलन्ति महर्ध्दयः कलयति ध्वंसं च यत्कर्मणां
स्वाधीनं त्रिदिवं करोति च शिवं श्लाध्यं तपस्तप्यताम् ॥
                        अर्थात
जिस से विघ्न परंपरा दूर होती है, देव दास बनते हैं, काम शांत होता है, इंद्रियों का दमन होता है, कल्याण नजदीक आता है, बडी संपत्ति का उदय होता है, जो कर्मो का ध्वंस करता है, और स्वर्ग का कब्जा दिलाता है, उस कल्याणकारी, प्रशंसनीय तप का आचरण करो ।
               "ॐ भगवते वासुदेवाय् नम:"

हे प्राणी धर्म को जान

धर्म को न जानकर मनुष्य दुःखी होता है ।
इस अस्थिर जीवन/संसार में धन, यौवन, पुत्र-पत्नी इत्यादि सब अस्थिर है ।
केवल धर्म, और कीर्ति ये दो हि बातें स्थिर है ।

"धर्मस्य दुर्लभो ज्ञाता सम्यक् वक्ता ततोऽपि च ।
श्रोता ततोऽपि श्रद्धावान् कर्ता कोऽपि ततः सुधीः ॥
                        अर्थात
धर्म को जाननेवाला दुर्लभ होता है, उसे श्रेष्ठ तरीके से बतानेवाला उससे भी दुर्लभ, श्रद्धा से सुननेवाला उससे दुर्लभ, और
धर्म का आचरण करनेवाला सुबुद्धिमान सबसे दुर्लभ है ।।"

"अथाहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेन्द्रिय संयमाः ।
दानमिज्या तपो ध्यानं दशकं धर्म साधनम् ॥
                       अर्थात
अहिंसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप और ध्यान – ये दस धर्म के साधन है ।"

"सुखार्थं सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ।
सुखं नास्ति विना धर्मं तस्मात् धर्मपरो भव ॥
                        अर्थात
सब प्राणियों की प्रवृत्ति सुख के लिए होती है, (और) बिना धर्म के सुख मिलता नहि ।
हे प्राणी इस लिए, तू धर्मपरायण बन ।"

Thursday, July 31, 2014

'ॐ' आत्मा का संगीत

ॐ है एक मात्र मंत्र है, व यही आत्मा का संगीत है

ओम का यह चिन्ह 'ॐ' अद्भुत है।
यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है।

ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना।  यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।
त्रिदेव और त्रेलोक्य का प्रतीक :

ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म
इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है
और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।

ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं।
यही है √ मंत्र बाकी सभी × है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं।
यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं।
संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।

Wednesday, July 30, 2014

भक्ति योग

ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति का मूल मंत्र है ।
भक्तियोग मे किसी ना किसी रूप से भगवान् को मानना आवश्यक है
और उसके प्रति श्रध्दा के साथ-साथ भगवान के प्रेम मे डूब कर उसके साथ एकीभूतः हो जाना ही
भक्ति-योग का लश्र्य है

"सा तस्मिन् परम प्रेम रूपा ॥
अर्थात्
ईश्वर मे परम अनुरक्ति रखना ही भक्ति हैं।"

"सच्चे व निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज करना ही भक्ति योग है।"

Tuesday, July 29, 2014

हनुमान साधना

ॐ हं हनुमंतये नम:
हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।

ऊँ रक्षोविध्यंसकाराय नमः
ऊँ वज्रकायाय नमः
ऊँ सर्वरोगहराय नमः
ऊँ बलसिद्धिकराय नमः
ऊँ महावीराय नमः

हनुमान साधना में शुद्धता, ब्रह्मचर्य का पालन एवं पवित्रता अनिवार्य है।
साधना पूर्ण आस्था, श्रद्धा और सेवा भाव से की जानी चाहिए।

हनुमान साधना तुरंत फल देती है।
इनकी पूजा-अर्चना अति सरल है, मानव जीवन का सबसे बड़ा दुख भय'' है और जो साधक श्री हनुमान जी का नाम स्मरण कर लेता है वह भय से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
"जय श्री राम"

योग‬

अशान्त व दुःखित मन,
जब
सुव्यवस्थित होकर शान्त व निर्द्वन्द्वतापूर्वक समस्थिति को प्राप्त होता है
उसे ही #योग कहते है।
"गीता २/४८"

Tuesday, July 22, 2014

आस्था का पर्व है कांवड़ यात्रा


भगवान ‪आशुतोष‬ देवी गंगा को ज्येष्ठ दशहरा को इस पृथ्वी पर लेकर आए थे। गंगा उनकी जटाओं में विराजमान हुईं। इसलिए भगवान शंकर को गंगा अत्यंत प्रिय हैं ।
‪गंगाजल‬ के अभिषेक से वह अत्यंत प्रसन्न होते हैं । इसी के साथ दुग्ध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित करने से भगवान आशुतोष भक्त पर प्रसन्न होते हैं और उस पर कृपा करते हुए मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं ।
श्रावण मास भगवान शिव की साधना का सर्वश्रेष्ठ समय है इसीलिए श्रद्धालु श्रावण मास में सोमवार के व्रत रखते हैं और भगवान भोलेशंकर की आराधना करते हुए उनके प्रिय पदार्थ उन्हें अर्पित करते हैं।
भारत में श्रावण मास में शिवभक्ति का विराट रूप और आस्था का अनंत प्रवाह
कांवड़ यात्रा के रूप में दृष्टिगोचर होता है।
"ॐ नमः शिवाय, हर हर महादेव"
हर हर गंगें..!!

Monday, July 21, 2014

शिवलिंग‬

शिवलिंग‬
प्रतीक हैं विश्व-ब्रह्मांड का जिसके कण-कण में भगवान शिव का वास है
और शिवलिंग पर विभिन्न सामग्रियों जैसे-दूध, दही, गंगाजल, घृत, गन्ने का रस, सुगंधित द्रव्य आदि से अभिषेक करने का यही तात्पर्य है कि
इन विभिन्न सामग्रियों के माध्यम से हम विश्व वसुधा को समुन्नत कर रहे हैं।
अपने कर्मों को विभिन्न रूपों में शिवरूपी ब्रह्मांड को अर्पण कर रहे हैं। यह समर्पण की भावना ही हमें शिव की ओर अर्थात कल्याण की ओर ले जाती है।

#शिवलिंग भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरूप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है।

जिस स्थान पर शिवलिंग की पूजा होती है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है। उस स्थान पर मृत्यु होने पर मनुष्य शिवलोक जाता है।
शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य और अंतकरण शुद्ध हो जाता है।
दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है। इससे अलग दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है।

तारकंब्रह्म परमंशिव इत्यक्षरद्वयम्।
नैतस्मादपरंकिंचित् तारकंब्रह्म सर्वथा॥

Saturday, July 19, 2014

शिव ही सर्वस्य

में शिव, तू शिव सब कुछ शिव मय है। शिव से परे कुछ भी नहीं है।

इसीलिए कहा गया है-
‘शिवोदाता, शिवोभोक्ता शिवं सर्वमिदं जगत्।
शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं। जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है।
शिव का अर्थ है-जिसे सब चाहते हैं। सब चाहते हैं अखण्ड आनंद को। शिव का अर्थ है आनंद।
शिव का अर्थ है-परम मेंगल, परम कल्याण।

शिवस्याभ्यन्तरे शक्तिः शक्तेरभ्यन्तरेशिवः।’ शक्ति शिव में निहित है शिव शक्ति में निहित हैं।
चन्द्र और चन्द्रिका के समान दोनों अभिन्न हैं। शिव को शक्ति की आत्मा कहा जा सकता है और शक्ति को शिव का शरीर। शिव को शक्ति का पारमार्थिक रूप कहा जा सकता है और शक्ति को शिव का प्रापंचिक रूप। शिव से भिन्न और स्वतंत्र शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है और शक्ति की अवहेलना की जाए तो शिव का आत्म प्रकाशन संभव नहीं है।

'एक एवं तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्नि कश्चन’
सृष्टि के आरम्भ में एक ही रुद्र देव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत की सृष्टि करते हैं, इसकी रक्षा करते हैं और अंत में इसका संहार करते हैं। ‘रु’ का अर्थ है-दुःख तथा ‘द्र’ का अर्थ है-द्रवित करना या हटाना अर्थात् दुःख को हरने (हटाने) वाला।

शिव की सत्ता सर्वव्यापी है। प्रत्येक व्यक्ति में आत्म-रूप में शिव का निवास है-
‘अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि।
सर्व शिवमयं ब्रह्म, शिवात्परं न किञचन।।

Friday, July 18, 2014

शिव को त्रिनेत्र कहा गया है

Wभगवान सदाशिव का एक नाम शत्रुहंता भी है।
हम इसका अर्थ लौकिक शत्रु का नाश करना समझते हैं, लेकिन इसका अर्थ है....
अपने भीतर के शत्रु भाव को समाप्त करना।

अनेक कथाओं में हम देखते हैं कि जब ब्रह्मांड पर कोई भी विपत्ति आई, सभी देवता सदाशिव के पास गए।
चाहे समुद्रमंथन से निकलने वाला जहर हो या त्रिपुरासुर का आतंक या आपतदैत्य का कोलाहल, इसी कारण तो भगवान शिव परिवार के सभी वाहन शत्रु भाव त्यागकर परस्पर मैत्री भाव से रहते हैं।

शिवजी का वाहन नंदी (बैल), उमा (पार्वती) का वाहन सिंह, भगवान के गले का सर्प, कार्तिकेय का वाहन मयूर, गणोश का चूहा सभी परस्पर प्रेम एवं सहयोग भाव से रहते हैं।

शिव को त्रिनेत्र कहा गया है।
ये तीन नेत्र सूर्य, चंद्र एवं वहनी है, जिनके नेत्र सूर्य एवं चंद्र हैं। शिव के बारे में जितना जाना जाए, उतना कम है। अधिक न कहते हुए इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि
शिव केवल नाम ही नहीं हैं अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड की प्रत्येक हलचल परिवर्तन, परिवर्धन आदि में भगवान सदाशिव के सर्वव्यापी स्वरूप के ही दर्शन होते हैं।

Thursday, July 17, 2014

कांवर एक अटूट आस्था

कांवर एक अटूट आस्था

कंधे पर रंग बिरंगे कांवर, उसमे गंगा जल ढोते, रास्ते भर भक्ति और आस्था मे सराबोर नारे ।
शिवभक्तों की इस भीड को देख सोचना पडता है कि आखिर इनमे कौन सी शक्ति है । बच्चे, बूढे, स्त्री-पुरूष सभी नंगे पैर, पथरीली कच्ची-पक्की सडक पर नदी-नाले पार करते हुए, अंतत: सही समय तक तय कर ही लेते हैं अपना सफर । पांव मे फफोले, पैरों की ऐंठन, जख्म और तलवों की जलन, किसी की भी परवाह न करते हुए भगवान शंकर को अपना जल चढा कर ही दम लेते हैं ।

अटूट आस्था और भक्ति भावना से ओत प्रोत रंग बिरंगी झंडियों, फूल मालाओं से सजी अपनी कांवरों मे रखे ताम्रघट मे यह गंगाजल लेकर चल पड्ते हैं शिव को अर्पित करने के लिए ।
माना जाता है कि सावन के महीने में भगवान शंकर का जलाभिषेक करना एक अलग महत्व रखता है । इनमे कठिन यात्रा की यह शक्ति है भक्ति और अटूट आस्था की ।

भारतीय जनमांनस की आस्था की जडें बहुत गहरी हैं । प्रत्येक काल मे यह श्रध्दा का केन्द्र रहे हैं । इन्हें नाराज करने का साहस देवताओं मे नही है । तांडव नृत्य कर सकते हैं तो भक्ति भावना से प्रशन्न हो कुछ भी देने मे जरा भी संकोच नही करते ।
रावण की भक्ति से प्रशन्न होकर उसे अमोघ शक्ति देने वाले तथा भस्मासुर को वर प्र्दान करने वाले भी यही भगवान शंकर हैं ।
भवानी शंकरौ वंदे
श्रध्दाविश्वास रूपिणैं
याम्यां बिना न पश्यंति सिध्दा
स्वान्त: स्थमीश्वरम ।:

ॐ की उपासना

ॐ- इस अक्षर की उपासना करे--
ॐ- यह अक्षर परमात्मा का सबसे समीपवर्ती (प्रियतम) नाम है। ॐ यह अक्षर उदगीथ है।
इन (चराचर) प्राणियों का पृथिवी रस (उत्पत्ति, स्थिति, और लय का स्थान) है। पृथिवी का रस जल है, जल का रस औषधियाँ हैं, औषधियों का रस पुरुष है, पुरुष का का रस वाक् है, वाक् का रस ऋक् है, ऋक् का रस साम है और साम का रस उदगीथ (ॐ) है। ऋक् और साम के कारणभूत वाक् और प्राण ही मिथुन है। वह यह मिथुन ॐ इस अक्षर में संसृष्ट होता है। जिस समय मिथुन (मिथुन के अवयव) परस्पर मिलते हैं उस समय वे एक दूसरे की कामनाओं को प्राप्त कराने वाले होते है। अतः ॐ अक्षर(उदगीथ) की उपसना करने वाले की संम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति होती है। ॐकार ही अनुमति सूचक अक्षर है।
श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणित वेदान्त-दर्शन के अनुसार जो तीन मात्राओं वाले ओम् रूप इस अक्षर के द्वारा ही इस परम पुरुष का निरन्तर ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यलोक मे जाता है तथा जिस प्रकार सर्प केंचुली से अलग हो जाता है, ठीक उसी प्रकार से वह पापो से सर्वथा मुक्त हो जाता है। इसके बाद वह सामवेद की श्रुतियों द्वारा ऊपर ब्रह्मलोक में ले जाया जाता है। वह इस जीव-समुदाय रूप परमतत्त्व से अत्यन्त श्रेष्ठ अन्तर्यामी परमपुरुष पुरुषोत्तम को साक्षात् कर लेता है। तीनों मात्राओं से सम्पन्न ॐकार पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही है, अपरब्रह्म नहीं।
(ओ३म्) यह ओङ्कार शब्द परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम है, क्योंकि यह तीन अक्षरों अ, उ, और म से मिल कर बना है, इनमें प्रत्येक अक्षर से भी परमात्मा के कई-कई नाम आते हैं। जैसे- अकार से विष्णु, विराट्, अग्नि और विश्वादि। उकार से महेश्वर, हिरण्यगर्भ, वायु और तैजसादि। मकार से ब्रह्मा, ईश्वर, आदित्य और प्रज्ञादि नामों का वाचक है। तथा अर्धमात्रा निर्गुण परब्रह्म परमात्मास्वरूप है।

ओमति ब्रह्म। ओमितीद ँूसर्वम्।
ओमत्येदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति।
ओमति सामानि गायन्ति।
ओ ँूशोमिति शस्त्राणि श ँूसन्ति।
ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति।
ओमित्यग्निहोत्रमनुजानति।
अमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति।
ब्रह्मैवोपाप्नोति।।

ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत की) अनुकृति है। हे आचार्य! ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके साम गायक सामगान करते हैं। ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता है। ॐ कहकर ही अग्निहोत्र प्रारम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ही ब्रह्म को प्राप्त करने की बात करता है। ॐ के द्वारा ही वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।