Friday, August 1, 2014

तप

.                      ॐ ॐ ॐ
             हिन्दुत्व मे तप की महत्ता...
मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन, आत्मचिंतन, मनोनिग्रह, भावों की शुद्धि - यह मन का तप कहलाता है ।

उद्वेग को जन्म न देनेवाले, यथार्थ, प्रिय और हितकारक वचन (बोलना), (शास्त्रों का) स्वाध्याय और अभ्यास करना, यह वाङमयीन तप है ।

देवों, ब्राह्मण, गुरुजन-ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा - यह शरीर का तप कहेलाता है ।

यस्माद्विघ्न परम्परा विघटते दास्यं सुराः कुर्वते
कामः शाम्यति दाम्यतीन्द्रियगणः कल्याणमुत्सर्पति ।
उन्मीलन्ति महर्ध्दयः कलयति ध्वंसं च यत्कर्मणां
स्वाधीनं त्रिदिवं करोति च शिवं श्लाध्यं तपस्तप्यताम् ॥
                        अर्थात
जिस से विघ्न परंपरा दूर होती है, देव दास बनते हैं, काम शांत होता है, इंद्रियों का दमन होता है, कल्याण नजदीक आता है, बडी संपत्ति का उदय होता है, जो कर्मो का ध्वंस करता है, और स्वर्ग का कब्जा दिलाता है, उस कल्याणकारी, प्रशंसनीय तप का आचरण करो ।
               "ॐ भगवते वासुदेवाय् नम:"

हे प्राणी धर्म को जान

धर्म को न जानकर मनुष्य दुःखी होता है ।
इस अस्थिर जीवन/संसार में धन, यौवन, पुत्र-पत्नी इत्यादि सब अस्थिर है ।
केवल धर्म, और कीर्ति ये दो हि बातें स्थिर है ।

"धर्मस्य दुर्लभो ज्ञाता सम्यक् वक्ता ततोऽपि च ।
श्रोता ततोऽपि श्रद्धावान् कर्ता कोऽपि ततः सुधीः ॥
                        अर्थात
धर्म को जाननेवाला दुर्लभ होता है, उसे श्रेष्ठ तरीके से बतानेवाला उससे भी दुर्लभ, श्रद्धा से सुननेवाला उससे दुर्लभ, और
धर्म का आचरण करनेवाला सुबुद्धिमान सबसे दुर्लभ है ।।"

"अथाहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेन्द्रिय संयमाः ।
दानमिज्या तपो ध्यानं दशकं धर्म साधनम् ॥
                       अर्थात
अहिंसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप और ध्यान – ये दस धर्म के साधन है ।"

"सुखार्थं सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ।
सुखं नास्ति विना धर्मं तस्मात् धर्मपरो भव ॥
                        अर्थात
सब प्राणियों की प्रवृत्ति सुख के लिए होती है, (और) बिना धर्म के सुख मिलता नहि ।
हे प्राणी इस लिए, तू धर्मपरायण बन ।"