"ॐ"
एकांत मे उत्तर या पुर्व मुख बैठकर आचमन करें तथा महेश्वर को प्रणाम करके सीधा शातं बैठे
जैसे निर्वात स्थान में दीपक स्थिर हो जाता हैं ऐसे बैठे और महेश्वर का ध्यान, नाक, कान , आंख, मन, बुद्धि के द्वारा करता रहे ।
ओंकार से देह को पूर्ण करें।
ॐकार को तीन मात्रा वाला जानना चाहिये। व्यंजन इसमे ईश्वर हैं पहली मात्रा विधुती, दुसरी तामसी तथा तिसरी निर्गुणी जाननी चाहिये , प्रणव धनुष आत्मा बाण, ब्रह्म लक्ष्य कहा गया हैं ।
ॐ में तीन मात्राएँ, तीन लोक , तीन वेद , तीन अग्नि, विष्णु के तीन डग हैं । अकार, उकार और मकार सहित ॐकार तीन मात्रा वाला कहा हैं। अकार भूलोक, उकार भुव लोक , व्यंजन सहित मकार स्वर लोक कहा हैं। ॐकार त्रिलोक मय हैं । उसका सिर त्रिविष्टप ( स्वर ) मय हैं। इसकी प्रथम मात्रा ह्वस्व, दूसरी दीर्घ तथा तीसरी प्लुत कहीं हैं।
इसलिए योग के द्वारा बुद्धिमान को आत्मा का चिंतन करना चाहिये ।
जैसे पका हुआ फल वायु के वेग से गिरा दिया जाता हैं वैसे ही रूद्र को नमस्कार करके सब पापों का नष्ट हो जाते हैं।

