ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति का मूल मंत्र है ।
भक्तियोग मे किसी ना किसी रूप से भगवान् को मानना आवश्यक है
और उसके प्रति श्रध्दा के साथ-साथ भगवान के प्रेम मे डूब कर उसके साथ एकीभूतः हो जाना ही
भक्ति-योग का लश्र्य है
"सा तस्मिन् परम प्रेम रूपा ॥
अर्थात्
ईश्वर मे परम अनुरक्ति रखना ही भक्ति हैं।"
"सच्चे व निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज करना ही भक्ति योग है।"
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