श्री कृष्ण कहते हैं -
"जो तुम हो वही मैं हूँ हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं हैं।
जैसे दूध में श्वेतता, अग्नि में दाहशक्ति और पृथ्वी में गंध रहती हैं
उसी प्रकार मैं सदा तुम्हारे स्वरूप में विराजमान रहता हूँ।"
"श्रीराधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर घनश्याम।
करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥"
राधा नाम की महिमा का स्वयं श्री कृष्ण ने इस प्रकार गान किया है-
"जिस समय मैं किसी के मुख से ’रा’ अक्षर सुन लेता हूँ, उसी समय उसे अपना उत्तम भक्ति-प्रेम प्रदान कर देता हूँ और ’धा’ शब्द का उच्चारण करने पर तो मैं प्रियतमा श्री राधा का नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे-पीछे चल देता हूँ"
आधौ नाम तारिहै राधा।
र के कहत रोग सब मिटिहैं, ध के कहत मिटै सब बाधा॥
राधा राधा नाम की महिमा, गावत वेद पुराण अगाधा।
अलि किशोरी रटौ निरंतर, वेगहि लग जाय भाव समाधा॥
"जय श्री राधेकृष्णा"
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