जीवन का रहस्य
तुम्हें मिल सकेगा, अगर नमन के द्वार से तुम गए।
अगर तुम झुके, तुमने प्रार्थना की, तो तुम प्रेम के केन्द्र तक पहुँच पाओगे।
परमात्मा को रिझाना करीब-करीब एक स्त्री को रिझाने जैसा है।
उसके पास अति प्रेमपूर्ण, अति विनम्र, प्रार्थना से भरा हृदय चाहिए। और जल्दी वहाँ नहीं है। तुमने जल्दी की, कि तुम चूके। वहाँ बड़ा धैर्य चाहिए। तुम्हारी जल्दी और उसका हृदय बंद हो जाएगा। क्योंकि जल्दी भी आक्रमण की खबर है।
इसलिए जो परमात्मा को खोजने चलते हैं, उनके जीवन का ढंग दो शब्दों में समाया हुआ है- प्रार्थना और प्रतीक्षा। प्रार्थना से शास्त्र शुरू होते हैं और प्रतीक्षा पर पूरे होते हैं। प्रार्थना से खोज इसलिए शुरू होती है।
ऊँ स्वप्रकाश आनन्दस्वरूप भगवान शिव को नमन !
और अब
इस नमन को बहुत गहरे उतर जाने दें।
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