Thursday, July 31, 2014

'ॐ' आत्मा का संगीत

ॐ है एक मात्र मंत्र है, व यही आत्मा का संगीत है

ओम का यह चिन्ह 'ॐ' अद्भुत है।
यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है।

ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना।  यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।
त्रिदेव और त्रेलोक्य का प्रतीक :

ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म
इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है
और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।

ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं।
यही है √ मंत्र बाकी सभी × है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं।
यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं।
संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।

Wednesday, July 30, 2014

भक्ति योग

ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति का मूल मंत्र है ।
भक्तियोग मे किसी ना किसी रूप से भगवान् को मानना आवश्यक है
और उसके प्रति श्रध्दा के साथ-साथ भगवान के प्रेम मे डूब कर उसके साथ एकीभूतः हो जाना ही
भक्ति-योग का लश्र्य है

"सा तस्मिन् परम प्रेम रूपा ॥
अर्थात्
ईश्वर मे परम अनुरक्ति रखना ही भक्ति हैं।"

"सच्चे व निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज करना ही भक्ति योग है।"

Tuesday, July 29, 2014

हनुमान साधना

ॐ हं हनुमंतये नम:
हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।

ऊँ रक्षोविध्यंसकाराय नमः
ऊँ वज्रकायाय नमः
ऊँ सर्वरोगहराय नमः
ऊँ बलसिद्धिकराय नमः
ऊँ महावीराय नमः

हनुमान साधना में शुद्धता, ब्रह्मचर्य का पालन एवं पवित्रता अनिवार्य है।
साधना पूर्ण आस्था, श्रद्धा और सेवा भाव से की जानी चाहिए।

हनुमान साधना तुरंत फल देती है।
इनकी पूजा-अर्चना अति सरल है, मानव जीवन का सबसे बड़ा दुख भय'' है और जो साधक श्री हनुमान जी का नाम स्मरण कर लेता है वह भय से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
"जय श्री राम"

योग‬

अशान्त व दुःखित मन,
जब
सुव्यवस्थित होकर शान्त व निर्द्वन्द्वतापूर्वक समस्थिति को प्राप्त होता है
उसे ही #योग कहते है।
"गीता २/४८"

Tuesday, July 22, 2014

आस्था का पर्व है कांवड़ यात्रा


भगवान ‪आशुतोष‬ देवी गंगा को ज्येष्ठ दशहरा को इस पृथ्वी पर लेकर आए थे। गंगा उनकी जटाओं में विराजमान हुईं। इसलिए भगवान शंकर को गंगा अत्यंत प्रिय हैं ।
‪गंगाजल‬ के अभिषेक से वह अत्यंत प्रसन्न होते हैं । इसी के साथ दुग्ध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित करने से भगवान आशुतोष भक्त पर प्रसन्न होते हैं और उस पर कृपा करते हुए मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं ।
श्रावण मास भगवान शिव की साधना का सर्वश्रेष्ठ समय है इसीलिए श्रद्धालु श्रावण मास में सोमवार के व्रत रखते हैं और भगवान भोलेशंकर की आराधना करते हुए उनके प्रिय पदार्थ उन्हें अर्पित करते हैं।
भारत में श्रावण मास में शिवभक्ति का विराट रूप और आस्था का अनंत प्रवाह
कांवड़ यात्रा के रूप में दृष्टिगोचर होता है।
"ॐ नमः शिवाय, हर हर महादेव"
हर हर गंगें..!!

Monday, July 21, 2014

शिवलिंग‬

शिवलिंग‬
प्रतीक हैं विश्व-ब्रह्मांड का जिसके कण-कण में भगवान शिव का वास है
और शिवलिंग पर विभिन्न सामग्रियों जैसे-दूध, दही, गंगाजल, घृत, गन्ने का रस, सुगंधित द्रव्य आदि से अभिषेक करने का यही तात्पर्य है कि
इन विभिन्न सामग्रियों के माध्यम से हम विश्व वसुधा को समुन्नत कर रहे हैं।
अपने कर्मों को विभिन्न रूपों में शिवरूपी ब्रह्मांड को अर्पण कर रहे हैं। यह समर्पण की भावना ही हमें शिव की ओर अर्थात कल्याण की ओर ले जाती है।

#शिवलिंग भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरूप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है।

जिस स्थान पर शिवलिंग की पूजा होती है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है। उस स्थान पर मृत्यु होने पर मनुष्य शिवलोक जाता है।
शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य और अंतकरण शुद्ध हो जाता है।
दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है। इससे अलग दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है।

तारकंब्रह्म परमंशिव इत्यक्षरद्वयम्।
नैतस्मादपरंकिंचित् तारकंब्रह्म सर्वथा॥

Saturday, July 19, 2014

शिव ही सर्वस्य

में शिव, तू शिव सब कुछ शिव मय है। शिव से परे कुछ भी नहीं है।

इसीलिए कहा गया है-
‘शिवोदाता, शिवोभोक्ता शिवं सर्वमिदं जगत्।
शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं। जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है।
शिव का अर्थ है-जिसे सब चाहते हैं। सब चाहते हैं अखण्ड आनंद को। शिव का अर्थ है आनंद।
शिव का अर्थ है-परम मेंगल, परम कल्याण।

शिवस्याभ्यन्तरे शक्तिः शक्तेरभ्यन्तरेशिवः।’ शक्ति शिव में निहित है शिव शक्ति में निहित हैं।
चन्द्र और चन्द्रिका के समान दोनों अभिन्न हैं। शिव को शक्ति की आत्मा कहा जा सकता है और शक्ति को शिव का शरीर। शिव को शक्ति का पारमार्थिक रूप कहा जा सकता है और शक्ति को शिव का प्रापंचिक रूप। शिव से भिन्न और स्वतंत्र शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है और शक्ति की अवहेलना की जाए तो शिव का आत्म प्रकाशन संभव नहीं है।

'एक एवं तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्नि कश्चन’
सृष्टि के आरम्भ में एक ही रुद्र देव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत की सृष्टि करते हैं, इसकी रक्षा करते हैं और अंत में इसका संहार करते हैं। ‘रु’ का अर्थ है-दुःख तथा ‘द्र’ का अर्थ है-द्रवित करना या हटाना अर्थात् दुःख को हरने (हटाने) वाला।

शिव की सत्ता सर्वव्यापी है। प्रत्येक व्यक्ति में आत्म-रूप में शिव का निवास है-
‘अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि।
सर्व शिवमयं ब्रह्म, शिवात्परं न किञचन।।

Friday, July 18, 2014

शिव को त्रिनेत्र कहा गया है

Wभगवान सदाशिव का एक नाम शत्रुहंता भी है।
हम इसका अर्थ लौकिक शत्रु का नाश करना समझते हैं, लेकिन इसका अर्थ है....
अपने भीतर के शत्रु भाव को समाप्त करना।

अनेक कथाओं में हम देखते हैं कि जब ब्रह्मांड पर कोई भी विपत्ति आई, सभी देवता सदाशिव के पास गए।
चाहे समुद्रमंथन से निकलने वाला जहर हो या त्रिपुरासुर का आतंक या आपतदैत्य का कोलाहल, इसी कारण तो भगवान शिव परिवार के सभी वाहन शत्रु भाव त्यागकर परस्पर मैत्री भाव से रहते हैं।

शिवजी का वाहन नंदी (बैल), उमा (पार्वती) का वाहन सिंह, भगवान के गले का सर्प, कार्तिकेय का वाहन मयूर, गणोश का चूहा सभी परस्पर प्रेम एवं सहयोग भाव से रहते हैं।

शिव को त्रिनेत्र कहा गया है।
ये तीन नेत्र सूर्य, चंद्र एवं वहनी है, जिनके नेत्र सूर्य एवं चंद्र हैं। शिव के बारे में जितना जाना जाए, उतना कम है। अधिक न कहते हुए इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि
शिव केवल नाम ही नहीं हैं अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड की प्रत्येक हलचल परिवर्तन, परिवर्धन आदि में भगवान सदाशिव के सर्वव्यापी स्वरूप के ही दर्शन होते हैं।

Thursday, July 17, 2014

कांवर एक अटूट आस्था

कांवर एक अटूट आस्था

कंधे पर रंग बिरंगे कांवर, उसमे गंगा जल ढोते, रास्ते भर भक्ति और आस्था मे सराबोर नारे ।
शिवभक्तों की इस भीड को देख सोचना पडता है कि आखिर इनमे कौन सी शक्ति है । बच्चे, बूढे, स्त्री-पुरूष सभी नंगे पैर, पथरीली कच्ची-पक्की सडक पर नदी-नाले पार करते हुए, अंतत: सही समय तक तय कर ही लेते हैं अपना सफर । पांव मे फफोले, पैरों की ऐंठन, जख्म और तलवों की जलन, किसी की भी परवाह न करते हुए भगवान शंकर को अपना जल चढा कर ही दम लेते हैं ।

अटूट आस्था और भक्ति भावना से ओत प्रोत रंग बिरंगी झंडियों, फूल मालाओं से सजी अपनी कांवरों मे रखे ताम्रघट मे यह गंगाजल लेकर चल पड्ते हैं शिव को अर्पित करने के लिए ।
माना जाता है कि सावन के महीने में भगवान शंकर का जलाभिषेक करना एक अलग महत्व रखता है । इनमे कठिन यात्रा की यह शक्ति है भक्ति और अटूट आस्था की ।

भारतीय जनमांनस की आस्था की जडें बहुत गहरी हैं । प्रत्येक काल मे यह श्रध्दा का केन्द्र रहे हैं । इन्हें नाराज करने का साहस देवताओं मे नही है । तांडव नृत्य कर सकते हैं तो भक्ति भावना से प्रशन्न हो कुछ भी देने मे जरा भी संकोच नही करते ।
रावण की भक्ति से प्रशन्न होकर उसे अमोघ शक्ति देने वाले तथा भस्मासुर को वर प्र्दान करने वाले भी यही भगवान शंकर हैं ।
भवानी शंकरौ वंदे
श्रध्दाविश्वास रूपिणैं
याम्यां बिना न पश्यंति सिध्दा
स्वान्त: स्थमीश्वरम ।:

ॐ की उपासना

ॐ- इस अक्षर की उपासना करे--
ॐ- यह अक्षर परमात्मा का सबसे समीपवर्ती (प्रियतम) नाम है। ॐ यह अक्षर उदगीथ है।
इन (चराचर) प्राणियों का पृथिवी रस (उत्पत्ति, स्थिति, और लय का स्थान) है। पृथिवी का रस जल है, जल का रस औषधियाँ हैं, औषधियों का रस पुरुष है, पुरुष का का रस वाक् है, वाक् का रस ऋक् है, ऋक् का रस साम है और साम का रस उदगीथ (ॐ) है। ऋक् और साम के कारणभूत वाक् और प्राण ही मिथुन है। वह यह मिथुन ॐ इस अक्षर में संसृष्ट होता है। जिस समय मिथुन (मिथुन के अवयव) परस्पर मिलते हैं उस समय वे एक दूसरे की कामनाओं को प्राप्त कराने वाले होते है। अतः ॐ अक्षर(उदगीथ) की उपसना करने वाले की संम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति होती है। ॐकार ही अनुमति सूचक अक्षर है।
श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणित वेदान्त-दर्शन के अनुसार जो तीन मात्राओं वाले ओम् रूप इस अक्षर के द्वारा ही इस परम पुरुष का निरन्तर ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यलोक मे जाता है तथा जिस प्रकार सर्प केंचुली से अलग हो जाता है, ठीक उसी प्रकार से वह पापो से सर्वथा मुक्त हो जाता है। इसके बाद वह सामवेद की श्रुतियों द्वारा ऊपर ब्रह्मलोक में ले जाया जाता है। वह इस जीव-समुदाय रूप परमतत्त्व से अत्यन्त श्रेष्ठ अन्तर्यामी परमपुरुष पुरुषोत्तम को साक्षात् कर लेता है। तीनों मात्राओं से सम्पन्न ॐकार पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही है, अपरब्रह्म नहीं।
(ओ३म्) यह ओङ्कार शब्द परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम है, क्योंकि यह तीन अक्षरों अ, उ, और म से मिल कर बना है, इनमें प्रत्येक अक्षर से भी परमात्मा के कई-कई नाम आते हैं। जैसे- अकार से विष्णु, विराट्, अग्नि और विश्वादि। उकार से महेश्वर, हिरण्यगर्भ, वायु और तैजसादि। मकार से ब्रह्मा, ईश्वर, आदित्य और प्रज्ञादि नामों का वाचक है। तथा अर्धमात्रा निर्गुण परब्रह्म परमात्मास्वरूप है।

ओमति ब्रह्म। ओमितीद ँूसर्वम्।
ओमत्येदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति।
ओमति सामानि गायन्ति।
ओ ँूशोमिति शस्त्राणि श ँूसन्ति।
ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति।
ओमित्यग्निहोत्रमनुजानति।
अमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति।
ब्रह्मैवोपाप्नोति।।

ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत की) अनुकृति है। हे आचार्य! ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके साम गायक सामगान करते हैं। ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता है। ॐ कहकर ही अग्निहोत्र प्रारम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ही ब्रह्म को प्राप्त करने की बात करता है। ॐ के द्वारा ही वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।

Wednesday, July 16, 2014

शिव

जीव (जीवात्मा) और जड (जगत) को कार्य कहा जाता है। परमात्मा (शिव) इनका कारण है, जिसको पति कहा जाता है। जीव पशु और जड पाश कहलाता है। मानसिक क्रियाओं के द्वारा पशु और पति के संयोग को योग कहते हैं। जिस मार्ग से पति की प्राप्ति होती है उसे विधि की संज्ञा दी गयी है। पूजाविधि में निम्नांकित क्रियाएँ आवश्यक है-
हँसना
गाना
नाचना
हुंकारना और
नमस्कार।
संसार में दुखों से आत्यन्तिक निवृत्ति ही दुःखान्त अथवा मोक्ष है।

शिव को नमन

जीवन का रहस्य
तुम्हें मिल सकेगा, अगर नमन के द्वार से तुम गए।
अगर तुम झुके, तुमने प्रार्थना की, तो तुम प्रेम के केन्द्र तक पहुँच पाओगे।
परमात्मा को रिझाना करीब-करीब एक स्त्री को रिझाने जैसा है।
उसके पास अति प्रेमपूर्ण, अति विनम्र, प्रार्थना से भरा हृदय चाहिए। और जल्दी वहाँ नहीं है। तुमने जल्दी की, कि तुम चूके। वहाँ बड़ा धैर्य चाहिए। तुम्हारी जल्दी और उसका हृदय बंद हो जाएगा। क्योंकि जल्दी भी आक्रमण की खबर है।

इसलिए जो परमात्मा को खोजने चलते हैं, उनके जीवन का ढंग दो शब्दों में समाया हुआ है- प्रार्थना और प्रतीक्षा। प्रार्थना से शास्त्र शुरू होते हैं और प्रतीक्षा पर पूरे होते हैं। प्रार्थना से खोज इसलिए शुरू होती है।

ऊँ स्वप्रकाश आनन्दस्वरूप भगवान शिव को नमन !
और अब
इस नमन को बहुत गहरे उतर जाने दें।

ॐ नमः शिवाय

‎साधना‬
जहां अध्यात्म ऊर्जा प्रदान करते हुये साधक में उच भाव भूमि प्रदान करती है | वही उसके जीवन की अनेक कमीये दूर हो जाती है | साधना से समाधि जैसा आनंद सहज ही प्राप्त हो जाता है | शरीर हर वक़्त एक विशेष ऊर्जा में आबद्ध रहता है और जीवन में आनंद का सराबोर होता है | हर वक़्त आनंद में ही रहता है | मन के विकारो पे विजय मिलती है और साधना में सफलता |
विधि –
यह साधना आप किसी भी सोमवार शुरू कर सकते है | आप किसी भी मंदिर अथवा घर में कर सकते है | इस के लिए आपको भगवान शिव का एक चित्र चाहिए और रुद्राश की माला और मंदिर में करे तो शिव जी का पूजन कर शिव लिंग के पास बैठ कर कर सकते है | इसे सुबह जा शाम कभी भी किया जा सकता है | चित्र का पूजन धूप दीप नवेद पुष्प फल आदि से करे और घी का दीपक लगाए गुरु पूजन करे फिर गणेश जी का पूजन करे और फिर शिव पूजन करे | इस से पहले चारो दिशयों में ॐ श्रीं ॐ बोल कर जल छिर्क दे इस से दिशा क्षोदन हो जाता है | फिर 5 वार प्राणायाम करे मतलव सांस ले और छोड़ दे ता जो आंतरिक क्षोदन हो जाए फिर रुद्राश माला से निमन मंत्र की 21 माला करे यह साधना आप शिवरात्रि से पहले कभी भी शुरू करे 11 दिन पहले कर सकते है | इस से कम न करे जायदा दिन हो फाइदा ही है और शिवरात्रि तक करे शिवरात्रि को 4 पहर की पुजा करे मतलव रात में 4 वार पुजा की जाती है और हर वार आपको 5 जा 11 माला मंत्र जप करना है | सुबह आरती करे और अपने कार्य कर सकते है | वैसे भी इस मंत्र का जप जायदा से जायदा कर लेना चाहिए इस के बहुत लाभ मैंने महसूस किए हैं | यह साधना शिवरात्रि पे ही नहीं किसी भी सोमवार से शुरू कर 21 दिन में भी की जा सकती है | इस लिए जो शिवरात्रि पे न कर पाये किसी भी सोमवार शुरू कर कर ले |

‪#‎मंत्र‬ ---
!! ॐ हँस सोहं परम शिवाए नमः !!
|| om hans soham param shivaye namah ||